Saturday, June 30, 2012

अब दृष्टि कुछ कमज़ोर हो चली है; सूक्ष्म अक्षर बिना चश्मे का नहीं दीखते / लगातार कंप्यूटर का साथ एक बोझ की तरह मन मस्तिष्क में थकान की सतह के ऊपर सतह बनाता जा रहा है / कुर्सियों पर देर तक बैठा आलस्य कमर के इर्द गिर्द इकठ्ठा होने लगा है / कभी कुछ सीढियां चढ़नी पड़ जाए तो सांस फूल जाती है; शारीरिक परिश्रम करना पड़े तो जीभ बाहर को निकल आती है / घर पहुँचते ही पहले बिस्तर दिखता है ;  कभी कभी टाँगे पसार कर या अधलेटा होकर टेलीविज़न के स्पोर्ट्स चैनल कुछ दूर तक साथ निभाते हैं; कुछ याद दिलाते हैं / चंद रोटियों और आयुर्वेदिक औषधियों के पश्चात् रात आती है और अचानक ही चली जाती है / ये कभी इतनी छोटी न हुआ करती थी / सुबह के तौलिये में शीशा दिखता है; मैं अपने 'मैं' को पहचानने की कोशिश करता हूँ / अब तो उसकी याद भी धूमिल हो चली है ; कितना दूर निकल आये हैं, अपनों से दूर, अपने से दूर / क्या ये ज़रूरी था ? क्या ये ज़रूरी है ?

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