अब दृष्टि कुछ कमज़ोर हो चली है; सूक्ष्म अक्षर बिना चश्मे का नहीं दीखते /
लगातार कंप्यूटर का साथ एक बोझ की तरह मन मस्तिष्क में थकान की सतह के ऊपर
सतह बनाता जा रहा है / कुर्सियों पर देर तक बैठा आलस्य कमर के इर्द गिर्द
इकठ्ठा होने लगा है / कभी कुछ सीढियां चढ़नी पड़ जाए तो सांस फूल जाती है;
शारीरिक परिश्रम करना पड़े तो जीभ बाहर को निकल आती है / घर पहुँचते ही पहले
बिस्तर दिखता है ; कभी कभी टाँगे पसार कर या अधलेटा होकर टेलीविज़न के
स्पोर्ट्स चैनल कुछ दूर तक साथ निभाते हैं; कुछ याद दिलाते हैं / चंद
रोटियों और आयुर्वेदिक औषधियों के पश्चात् रात आती है और अचानक ही चली जाती
है / ये कभी इतनी छोटी न हुआ करती थी / सुबह के तौलिये में शीशा दिखता है;
मैं अपने 'मैं' को पहचानने की कोशिश करता हूँ / अब तो उसकी याद भी धूमिल
हो चली है ; कितना दूर निकल आये हैं, अपनों से दूर, अपने से दूर / क्या ये
ज़रूरी था ? क्या ये ज़रूरी है ?
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