जो पैबंद लगाये थे,
खिसिया कर अब खुलने लगे हैं,
कभी सोचा था,
एक ज़मीन होगी अपनी भी,
पर रोज़,
पैबंद की,
एक सिलाई और उधड़ जाती है,
अब,
जादू नहीं होते....
खिसिया कर अब खुलने लगे हैं,
कभी सोचा था,
एक ज़मीन होगी अपनी भी,
पर रोज़,
पैबंद की,
एक सिलाई और उधड़ जाती है,
अब,
जादू नहीं होते....
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