कब तक खाली बातें ही खन्गालोगे
क्या भेड़ियों को शहर से निकालोगे,
वो कहीं और जाकर बस जायेंगे,
और मासूमियत को यूँ ही उजाड़ेंगे,
क्या इतनी हिम्मत बटोर पाओगे,
इन्हें रुखसत इस जहान से कराओगे,
क्योंकि ये 'कुछ' नहीं हैं, बहुत सारे हैं,
जिंदा शरीर से हैं, आत्मा से मारे हैं,
ज़रुरत है हम सब को सावधान करें,
मिलकर इन भेड़ियों का समाधान करें,
कानून और प्रशासन के सहारे न बैठें,
खुद शेर बनें, बस खाल ओढ़ न एंठें,
खुदगर्ज़ हम, खुदगर्ज़ हमारा रहन सहन है,
पर याद रहे इसी जंगल में बेटी है,बहन है ...
क्या भेड़ियों को शहर से निकालोगे,
वो कहीं और जाकर बस जायेंगे,
और मासूमियत को यूँ ही उजाड़ेंगे,
क्या इतनी हिम्मत बटोर पाओगे,
इन्हें रुखसत इस जहान से कराओगे,
क्योंकि ये 'कुछ' नहीं हैं, बहुत सारे हैं,
जिंदा शरीर से हैं, आत्मा से मारे हैं,
ज़रुरत है हम सब को सावधान करें,
मिलकर इन भेड़ियों का समाधान करें,
कानून और प्रशासन के सहारे न बैठें,
खुद शेर बनें, बस खाल ओढ़ न एंठें,
खुदगर्ज़ हम, खुदगर्ज़ हमारा रहन सहन है,
पर याद रहे इसी जंगल में बेटी है,बहन है ...
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