Tuesday, December 11, 2012

कुछ है जो जागने नहीं देता ... और उठ कर के लाख कोशिशें कर लो, फिर सोने नहीं देता ....परिस्थिति वक़्त के साथ सहानभूति भी रखती है और झुंझलाहट भी ... यह अजीब है क्योंकि मस्तिष्क अक्सर कई ऐसी स्थितियों को मानने से इनकार कर देता है जिन्हें ह्रदय सहर्ष स्वीकार कर लेता है ...वह इसे intellectual simulation कहता है ...बौद्धिक अनुकरण .

 सब कुछ ठीक चलता है ....अपनी रफ़्तार से ...क्योंकि सफ़र तो अभी प्रारंभ हुआ है ...ये रास्ता ही अपने आप में एक मंजिल है ...मील के पत्थर पड़ाव हो सकते हैं पर सफ़र का काम तो चलना ही है ....लगातार रातों का काम दिन की आँखों पर भारी पड़ने लगता है ....कोई  सुपरमैन नहीं है ...पर जहाँ तक बन पड़ता है, करता है ...दिल की पीड़ा आँखों की थकान में घुली रहती है ...दर्द से निपटने के हम सब के अपने तरीके होते हैं ...मैं कुछ नहीं पूछता .

एक जन्मदिन पर माँ का वात्सल्य बंट जाता है और एक दुआ ह्रदय से निकलते ही टूटते तारे में समा जाती है ...धुओं के अस्थायी गुबार से होती हुई। कभी कभी नाम के मायने नहीं होते ...हाथों से बनाये व्यंजनों और जाम से गुज़रते हुए अस्पताल की चौखटों तक ये रिश्ते बेनाम ही रह जाते हैं ...शायद ये दूसरी दुनिया के रिश्ते हैं जो कहीं अधूरे रह  गए थे ... जैसे ये पहले भी था ...वैसे ही जैसे स्वप्न में फुटबॉल खेलते हुए हम कई गोल दाग देते हैं और जागने पर कुछ देर तक वह एहसास हमारे साथ रहता है ...यह सब अदभुत है ...खुशकिस्मती शायद किसी और नाम से मेरे पास आई है।

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