रास्तों के जुगनू
Saturday, March 1, 2014
पलकें झुका कर क्या था कहा,
नयनोँ से क्या था बरबस बहा,
आँखें खुलीं तो फिर न मिला,
स्वपन का खोया…खोया ही रहा।
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