मर्ज़ जाता ही नहीं यादोँ का,
कैसे लम्हो की दवाई दी है;
खोयी हुई नींद तुम चली आओ,
हमने फिर खुद की सफ़ाई दी है;
रात को ओढ़ चाँद का घूँघट,
दिन में कैसी जगहंसाई दी है;
आज फिर तुझको बंद नज़र करके,
हमने फुर्सत को रिहाई दी है;
कैसे लम्हो की दवाई दी है;
खोयी हुई नींद तुम चली आओ,
हमने फिर खुद की सफ़ाई दी है;
रात को ओढ़ चाँद का घूँघट,
दिन में कैसी जगहंसाई दी है;
आज फिर तुझको बंद नज़र करके,
हमने फुर्सत को रिहाई दी है;
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