Thursday, April 10, 2014

याद है अब भी ,
बचपने की वो कच्ची सड़क,
गाँव की,
और उस पर दौड़ती पुरानी जीप,
लाउडस्पीकर और ढेर सारी धूल;
और पीछे भागते हम,
न कोई शिकवा न कोई गम;
जीप में से लहराते पर्चे,
हवा में उड़ते,
कुछ काले कुछ रंग बिरंगे,
और कुछ फेंके गए बिल्ले,
जो थी हमारी जागीर,
जिनमे थी तस्वीर,
दो जोड़ी बैल,
बछड़े को दूध पिलाती गाय,
कंधे पर हल रक्खा किसान,
तब क्या पता था,
कौन साहूकार कौन बेईमान,
तब चुनाव के माने थे वे पर्चे,
और इकट्ठे किये वे बिल्ले,
जब भी गोलियां खेलते,
ये बिल्ले ही दांव पर लगते;
तब वोट एक शब्द था,
जिसे औरतें गाती थीं,
चाव से,
"चला सखी वोट देई आई,
मोहर गैया पर लगाई "

आज भी वोट एक शब्द है,
आज भी वह दांव पर लगता है,
आज भी,
उस पर दांव लगाया जाता है,
आज भी सब साहूकार हैं,
और सब बेईमान,
आज भी कंधे पर,
हल ढोता है किसान;
आज पक्की सड़कोँ पर,
गाड़ियो का कारवाँ,
ढेर सारी धूल,
झोँक जाता है,
इन खुली आँखोँ में,
आज भी चुनाव का मतलब,
कुछ पर्चे हैं,
हरे रंग के,
आज भी वोट एक शब्द है;

                 ----- नीरज त्रिपाठी 

'तुम दिल्ली का दरवाज़ा खोलो,
हम बस दिल को दस्तक दें दें '

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