वो भी दिन थे,
जब सर्द रातों में भी,
हथेली पर पसीना आता था,
बस कभी कभी ही,
कोई जुगनू टिमटिमाता था;
अंधेरों में कितने ही सपने,
देखे, टूटे, फिर देखे,
ख़्वाहिश थी कुछ मिले रौशनी,
कोई सपन तो इक उम्र तक पले,
फिर तुम दिखे तो दीये जले;
आशंकाओं की हथेली पर,
चाहे बीत गयी कितनी ही दिवाली,
पर रौशन रहे आँखों में चिराग,
कभी न बुझे,
जब से देखा है तुझे।
जब से देखा है तुझे।
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