गांव गली सब घूम लिया,
बाग़ बगीचा घूम लिया,
सड़कें, रेलें और समंदर,
शहर समूचा घूम लिया;
घूम लिया जौ की रोटी औ,
गुड़ का शरबत घूम लिया,
टूटी खाट, सिकुड़ती चौखट,
और गरीबी घूम लिया;
घूम लिया मन की लाचारी,
तन का दर्पण घूम लिया,
साधू संत और व्यभिचारी,
सब का अर्पण घूम लिया;
घूमे रिश्तों की तलहट में,
सब भावों को घूम लिया,
जीवन तेरे आधे जग में,
लगता ब्रह्माण्ड है घूम लिया।
लगता ब्रह्माण्ड है घूम लिया।
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