अमावस में जब,
खिडकियों के परदे समूचा चाँद सोख लेते हैं,
और तारे ख्व़ाब बनकर नहीं उतरते,
तब भी बंद आँखों में,
तुम जुगनू से जगते हो,
रह रह कर बनाते हो एक चाँद,
जिन्हें मैं तारों से सजाता हूँ,
अब नींद कहीं नहीं जाती है,
कल्पनाओं की चादर में लिपट,
हौले हौले चली आती है.....
खिडकियों के परदे समूचा चाँद सोख लेते हैं,
और तारे ख्व़ाब बनकर नहीं उतरते,
तब भी बंद आँखों में,
तुम जुगनू से जगते हो,
रह रह कर बनाते हो एक चाँद,
जिन्हें मैं तारों से सजाता हूँ,
अब नींद कहीं नहीं जाती है,
कल्पनाओं की चादर में लिपट,
हौले हौले चली आती है.....
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