इन दिनों फुर्सत कुछ नाराज़ रहती है मुझसे ; वक़्त नहीं है उसके पास मेरे
लिए / हमेशा ऐसा नहीं था...कभी मैं तसल्ली से बैठ कर बारिश की बूंदों को
पेड़ों के पत्तों से झर झर झरते देखा करता था / एक अजीब सी कसमसाहट है दिल
में, जैसे कुछ छूटता जा रहा है पीछे...जिसे छूटना नहीं चाहिए; रोज़मर्रा की
जिंदगी जब बिलकुल रोज़मर्रा सी लगे तो समझ लेना चाहिए की बदलाव की दस्तक है /
कुछ अपना ही लिखा याद आता है....
अब रात का मन रात में नहीं लगता,
दिन भी मेरे साथ साथ नहीं जगता;
रोज़ कैसे मन के अपने भाव हारूँ,
कुछ नया मिले एक मन फिर संवारूँ;
मूक दिखती चिड़ियों के संग फिर बोलूं,
जो चिपके हैं अधर से वो लिफ़ाफ़े खोलूं ;
कुछ अपना हार कर कुछ उन्हें जिताऊं,
ऊब गया हूँ, कुछ वक़्त कहीं और बिताऊं;
अब रात का मन रात में नहीं लगता,
दिन भी मेरे साथ साथ नहीं जगता;
रोज़ कैसे मन के अपने भाव हारूँ,
कुछ नया मिले एक मन फिर संवारूँ;
मूक दिखती चिड़ियों के संग फिर बोलूं,
जो चिपके हैं अधर से वो लिफ़ाफ़े खोलूं ;
कुछ अपना हार कर कुछ उन्हें जिताऊं,
ऊब गया हूँ, कुछ वक़्त कहीं और बिताऊं;
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