इन दिनों कोई नहीं बुलाता हमें,
जैसे तुम बुलाते थे,
कोई और नहीं बताता हमें,
जैसे तुम बताते थे;
इन दिनों कोई नहीं जानता हमें,
जैसे तुम जानते थे,
कोई और मानता नहीं,
जैसे तुम मानते थे;
इन दिनों कोई नहीं है,
न बात करने को, न बात कहने को,
वो बात जो हम अक्सर करते थे,
जो सिर्फ हम समझते थे;
तुम्हारी चुप्पी,
शायद मनमर्ज़ी नहीं है,
नाजायज़ तो बिलकुल नहीं,
पर चुप्पी तो है ;
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