किसी ज़िद्दी से पौधे का,
टूट कर भी सांस लेना,
और उसी जगह पर,
बार बार उग जाना;
किसी का रुक कर चले जाना,
या जाकर फिर नहीं आना,
या परिचित से पथ पर,
न रहते हुए भी समझाना;
किसी का दिन की व्यस्तता में,
धुंधला हो जाना,
पर गोधूलि में,
अनायास छलक आना;
यही बताता है,
कि हम भावों से,
कभी रिक्त नहीं होते,
कोशिशों के बाद भी,
इससे अतिरिक्त नहीं होते;
उम्र की दोपहर बीत गयी,
तब जाकर ये जाना,
कि जज़्बातों के,
पैग़ाम नहीं होते,
परिणाम भी नहीं होते,
अवकाश होते हैं शायद,
पर आयाम नहीं होते।
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