Sunday, April 16, 2023

 

भरे बाज़ार गोलियों की तड़तड़ाहट,
तब भी थी,
जब सी सी टीवी कैमरा न थे,
जब इतना मीडिया न था;
तब भी,
गोली सिर्फ दवा की नहीं होती थी,
तब भी डर अँधेरे में फुसफुसाता था,
और घर के हर बाहरी  दरवाज़े पर,
अंदर से ताला लगाता था;

उस भय का भी,
लोगों का अपना अपना तर्क है,
पर अब दुनिया देख रही है,
बस यही एक फ़र्क है;

यूँ तो हर इंसान,
किसी न किसी वजह से,
अंदर थोड़ा सा शर्मिंदा है,
पर वह क्यों देखे पड़ोस में,
कम से कम वह तो ज़िंदा है;

यह जो माहौल है,
और कुछ नहीं हमारी अपनी करनी है,
बस हमारे घर से दूर रहे पर ,
कहीं न कहीं तो रोज़ गोली चलनी है;

हर साल,
करते हैं भगीरथी का स्नान,
मानते हैं कि हम धुल गए,
और कर देते हैं इंकार,
कि हम भी,
इसी माहौल में घुल गए;

आज जब बैठो सड़क पर,
लेकर दोने में,
समोसा, छोले और खट्टी मीठी चटनी,
और कुल्हड़ भर चाय,
तो सोचना ज़रा की क्यों,
हक़ीकत सबब भी है,
और सबक भी ;

 

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