हसरतों के बादल,
जब छंटते हैं,
तब तक अरसा,
गुज़र जाता है,
बस गुबार बंटते हैं...
थकान का आकार,
शरीर से मिलता है,
और बूढ़े कंधे पर लटका ,
खाली झोला,
हवा में बेमन हिलता है;
वक़्त के साथ,
और असलियत के आभास से,
अन्दर का ढांचा,
शनै शनै गलता है,
पर धन्य है वो आदमी,
जो फिर भी चलता है....
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