Monday, August 27, 2012

आज फिर बारिश की रात है ! कहने को तो ये अचानक आई थी पर दिन में निकली उमसदार धूप शाम को बादलों में जाकर  कड़कती बिजली बन गयी थी ; फिर तो बारिश का आभास होना ही चाहिए था / पर हम कितनी सरलता से अनायास ही कह देते हैं कि अचानक बारिश आ गयी ;  मानो बरसात के मौसम में हम कुछ और ही उम्मीद लगाये बैठे थे / मैं कमरे में बैठा टी वी पर कोयले कि दलाली देख रहा था कि अचानक  सिग्नल आने बंद हो गए / डिश टी वी में यही एक खराबी है कि ख़राब मौसम में यह भी ख़राब हो जाती है / ख़ैर ! मैं फिर भी इसका कृतज्ञ हूँ कि इसकी वजह से मेरा पाव भर खून जलने से बच गया ; वरना जिस तरह से ये राजनेता टी वी पर आरोप प्रत्यारोप जड़ रहे थे, उससे से तो एक आम आदमी का खून ही जल सकता है / इससे बेहतर है कि कोयला ही जले, चाहे सतह के ऊपर हमारे पसीने पर या सतह के नीचे धरती के गर्भ में / खून बचा रहेगा तो ऐसे न जाने कितने घोटाले देखने सुनने का सौभाग्य मिलता रहेगा, और मुझे सदैव गर्व रहेगा हमारे चुनाव पर और हमारी चुनावी प्रक्रिया पर / ऐसे बिरले ही देश होंगे जिन्हें भगवान् चलाता है; यूँ ही नहीं हमारे अधिकतर टूरिस्ट प्लेस मंदिर और मकबरे हैं; हमारी ईश्वर में आस्था इतनी अटूट है कि स्वयं और परिवार के अलावा हमने अपने देश को भी उसके हवाले कर रखा है / इस देश में तो ईश्वर के  पैरों की खड़ाऊँ ने राज किया है; फिर ये नेतागण तो ईश्वर के बनाये हुए इंसान है; ये राज क्यों न करें / क्या कहते हैं आप लोग ?

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