Saturday, August 4, 2012

इस इग्यारहंवे मंजिल के फ्लैट की बालकनी से एक दुनिया दिखती है; कंक्रीट और कुछ हरे पेड़ों में घुली हुई...पास की इमारत के ऊपरी मंजिल को बादल यूँ छू कर निकलता है जैसे धुआं रिस रहा हो... ये रात सन्नाटों में जागने की रात है...धुंए और बातों के बीच एक अक्स तलाशने की रात है...इसे और कोई नहीं समझता...बस वो और मैं...कमरे में पड़े एक पिंजरे में पड़ी तकिया पर कफी कान खुजाता रहता है...तकलीफ है उसे... तकलीफ है हम सब को...कुछ दिखती है कुछ नहीं...वो कुछ बताता है...कुछ टाल जाता है...दर्द रिसता है पर लहू नहीं दिखता...फिर कभी...अभी सिर्फ सकारात्मकता का दौर है...क्या पा सकते हैं...किसको खोने से बचाना है...क्या करना है और क्या नहीं....इतनी तल्लीन रात पहले कभी नहीं आई...पहले कभी किसी ने इस तरह नहीं समझा...नहीं समझाया..ये इत्तफाक नहीं हो सकता...ये होना था...आगे बहुत से दिन देखने बाकी हैं...पर इस रात की छाप उनपर उजाले सी गिरेगी...मैं एहसानमंद नहीं हूँ...कृतज्ञ भी नहीं...बस खुद को खोजा हुआ पाता हूँ...वो समझता है और बहुत जगह चुप रहता है...नकारात्मकता नहीं आनी चाहिए..शहरी रात के उजाले में बादल तैरते हुए साफ़ दिखते हैं...अब बस इंतज़ार है...चुनौतियों का...एक बादल अपना भी है.

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