उसे फौज के मायने नहीं मालूम, उसे तो बस आदत है अपने पिता को छुट्टियों
में आते जाते देखने की; वह खड़ी हो जाती है सामने पत्थर पर, नन्ही सी
हथेलियाँ बच्ची की, अपने फौजी बाप को कन्धों पर होल्डाल लटकाए पहाड़ियों के
टेढ़े मेढ़े रास्तों से उतरता देखती हैं....
यह अब आम बात है, रोज़मर्रा सी; इन पथरीले रास्तों से उतरते वक़्त निगाह रह
रह कर ऊपर जाती है, वह अब भी खड़ी है...हाथ हिलाती हुई ; वह रोती नहीं है,
जिद्द नहीं करती, कुछ नहीं मांगती, बस हाथ पकड़े कुछ दूर तक आती है; फिर
उसकी मां उसे वापस ले जाती हैं...और वह दौड़ कर उस बड़े पत्थर पर चढ़ जाती
है, हाथ अपने आप हवा में हिलने लगते हैं;
नीचे आधे घंटे की उतरन के बाद सड़क मिलेगी, और साधन भी...जमरू का घर
निकल गया...उसकी मुर्गियां भी, ये पहाड़ी उबड़ खाबड़ रास्ते, मंदिर, एक मिनट
का रुकना...फिर पत्थरों की ढलान पर कदम....बुधिया के आडू के पेड़...बस झरना
आ ही गया समझो...इसके आगे एक घुमाव और फिर चार फलांग पर सड़क...शरीर फिर
मुड़ता है...निगाहें ऊपर जाती हैं..कितना नीचे उतर आये..वह रहा मंदिर का
लाल झंडा...और उसके ऊपर बड़ा पेड़...और ...वो अब भी दीखती है...हाथ हिलाती
हुई.
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