हाल के बीते ज़माने, शौर्य से भरपूर थे,
और अपने कारनामे, शहर में मशहूर थे;
भूल बैठे थे समय में समय की जादूगरी को,
सोचते तन मन भी अपने शस्त्र से तैमूर थे;
परचम भी फहरा रहा था, गर्व के ऊँचे शिखर पर,
कुछ असर था खून का, कुछ हम नशे में चूर थे;
थम गए लेकिन वहीँ पर, जब ली करवट वक़्त ने,
थीं भुजाएं साथ पर हम पैरों से मज़बूर थे;
व्यर्थ सा लगने लगा है, जो मिला था राह में,
रह गए हम उतने, जितने वक़्त को मंज़ूर थे;
No comments:
Post a Comment