इन दिनों रोज़ शाम को छत से डूबते सूरज को निहार लेता हूँ ; पश्चिमी भारत के इस भाग में अँधेरा जल्दी नहीं होता पर यूँ भी कौन चाहता है कि जल्दी अँधेरा हो जाए। दिन भर घर के अंदर ही घर और ऑफिस खुला रहता है ; रोज़ के आँकड़ों के बीच कितनी ही कामनायें जीवित रहती हैं। कितनी ही सड़कों का दम घुट गया है इन दिनों क्यूंकि कोई गंतव्य नज़र नहीं आ रहा। पर गंतव्य तो होगा वरना क्यों रोज़ सूरज मेरी छत से आता जाता दीखता है। क्यों कबूतर अब भी अँधेरा होने से पहले बैठ जाते हैं अपने उन चिर परिचित स्थानों पर; क्यों सांझ होते ही बयार अपने अंदाज़ में बहने लगती है ; क्यों पश्चिम का आकाश फिर से नारंगी हो जाता है ; गंतव्य तो होगा ; नज़र आये शायद एक और रात के बाद , नज़र आये शायद अगली सुबह में।
उम्मीद एक ऐसा गहना है जिसे पहनो या न पहनो, शरीर उससे अलग कभी नहीं हो पाता ; हमारी आस्था प्रत्येक शाम घरों में होती आरती और तुलसी पर रखे दीये में सुरक्षित रहती है। हम शायद पहले से कहीं अधिक आध्यात्मिक हो गए हैं, और सहनशील भी। हमारा विश्वास है कि ये आंकड़े जल्द बदलेंगे और सड़कें फिर साँसें लेंगी ; विश्वास है हमें कि अस्पताल में जगह होगी और हम फिर भी वहाँ नहीं जायेंगे। विश्वास है हमें कि हमारी आशंकाओं पर जल्द विराम होगा और विश्वास है हमें कि मात्र ह्रदय में राम होगा। सूरज का डूबना ही उसके फिर से निकलने का संकेत है। हर शाम अब विशेष है।
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