जब नहीं कोई हुनर था, तब नहीं कोई अहम् था,
साथ में विश्वास था तब, बचपना ही तब धरम था,
तब थे झगड़े क्षणिक होते, दो घड़ी में भूल जाते,
तू बड़ा या मैं बड़ा हूँ, तब नहीं कोई भरम था;
बुद्धि से लेकिन ये जाना, लिख पढ़े हम हो गए हैं,
पैर पर निर्भीक अपने, अब खड़े हम हो गए हैं,
कितना देखो बढ़ गया है, अब हमारा कार्य कौशल,
बचपना खुद सो गया , इतने बड़े हम हो गए हैं;
अब नहीं व्यवहार में, किंचित भी दिखता वह लड़कपन,
अब तो बस दिखती हैं कमियाँ, दूसरे में हमको छप्पन,
बात जो लगती थी भोली, लगती है अब तीखी छूरी,
इस सफर में किस तरह से आ गया हमको बड़प्पन;
कब गिरेगा बोझ भारी, यह अहम् जो ढो रहा है,
आज है एहसास इसका, आज फिर दिल रो रहा है,
मन है फिर से ढूंढ़ पाएं, द्वेष को रख कर किनारे,
नींद खुल जाए पुनः से, बचपना जो सो रहा है।
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