Monday, May 17, 2021

अब तूफान की सूचना तूफान आने से पहले मिल जाती है। समय रहता है कि ऐसे प्रयास किये जाएं कि कम से कम जान माल की क्षति हो; या इतनी तैयारी हो कि नुकसान वाली स्थिति को जल्द से जल्द सामान्य किया जा सके।  हमारी सैटेलाइट अब समुद्र से बात कर सकती है और इतना अंदाजा लगा सकती है कि चक्रवात का मुँह किस तरफ को खुला है; कि उसके पैर किन रास्तों पर पड़ेंगे; कि किन रेतीले तटों में सुराख हो जाएगा; कि क्या डूब कर राख हो जाएगा।

हमने कोरोना की वैक्सीन बना दी; और कोरोना को रहने दिया ; मास्क बना दिए पर मुँह को खुला रखा ; सेनिटाइज़र बना दिए पर हथेलियां सूखी ही रहीं। पहले हमने अल्प को विस्तृत बनाया और विस्तृत हो जाने पर उसे अल्प ही रहने दिया। हमने डाटा बनाया भी और डाटा छिपाया भी ; ऑक्सीजन बनाई भी और जानें गँवाई भी। जलती चिता न पहले बात करती थी, न अब बात करती हैं।  इन्ही नदियों में राख भी बह  रही है और बह रहे हैं कुछ लावारिस भी। 

पता नहीं हमारा विज्ञान हमारी ज़रूरतों से जन्मा है या विज्ञान के जन्म के पश्चात हमारी ज़रूरतें बनायी गयी हैं। अद्भुत हैं हम और अद्भुत है हमारा विज्ञान; कितना कुछ जान गए हैं,कर रहे हैं......पर अरब सागर हो या ज़िंदगी, हम अब भी तूफानों को नहीं रोक पाते।

आने दो इन तूफानी हवाओं को भी..... शायद ये उन यादों को साथ ले जाएं जिनकी राख अभी ठंडी नहीं पड़ी....... उन वादों को भी जो पता लगा गलती से किये गए थे..... इस ज़िंदगी में।

 

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