बचपने से ज्ञान को था बुद्धि पर मढ़ता रहा,
दर्शनों को बूझता और पुस्तकें पढ़ता रहा,
वेग लेकिन बाँध से जब भी कभी अड़ता रहा,
तब ह्रदय अविरुद्ध होकर बुद्धि से लड़ता रहा;
युद्ध भी और बुद्ध भी सब स्वयं का व्यवहार है,
जो मिला जीवन में वो व्यवहार का ही सार है,
एक नादानी का आलम आग सा तपता रहा,
कालिखेँ लगती गयीं और शोर भी बढ़ता रहा;
समय यूँ तो हर सितम का स्वयं ही उपचार है,
किन्तु पश्चाताप पर भी समय का अधिकार है,
बारिशों की रहमतों से ताप भी बुझता रहा,
कालिख़ें तो धुल गयीं लेकिन धुआं उठता रहा;
जो चमक है पुतलियों में हर्ष का अभिमान है,
वेदना भी किन्तु बीते हर्ष का परिणाम है,
कुछ परस्पर वेदना में ह्रदय था बंटता रहा,
झुर्रियाँ बढ़ती रहीं और केश था घटता रहा;
द्वन्द में तो बुद्धि का भी क्रुद्ध होना आम है,
किन्तु मन की भावना भी चेतना का नाम है,
क्रोध चाहे हर घड़ी अवरोध ही गढ़ता रहा,
बोध लेकिन हर विषम में सूर्य सा चढ़ता रहा;
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