लगता है कितना कुछ बिखरा हुआ है...... एक गाँव है, पूर्वांचल की धरती पर, उजड़ते बागों और सिमटते खलिहानों के बीच ; अधपक्के मकान
के सामने से गुज़रती हुई पक्की सड़क और उस पर तन्द्रा भंग करती भागती खिसकती
गाड़ियाँ; मेरे कुछ अपने रहते हैं वहां... ठिठुरती सर्द और लपलपाती लू के
दरमियाँ वहां जीवन अब भी पलता है; अब मैं अक्सर वहां नहीं जा पाता, हाल खबर
मिलती रहती है; वहां ज्यादा कुछ नहीं बदलता...सब कुछ अपनी गति से चलता
रहता है...जैसे ठहरा हुआ हो.
गाँव से कुछ बीस कोस दूर एक शहर है; गंगा जमुनी भूगोल में सांस लेता हुआ...कहते है यहाँ बुद्धिजीवी रहते हैं, या शायद रहते थे क्योंकि अब दिखाई नहीं देते; शहर की सीमा के छोर पर राष्ट्रीय राजमार्ग के किनारे ठहरा हुआ एक हवाई अड्डा, और उसी से सटी एक भूतपूर्व सैनिकों की कालोनी....यहाँ एक मकान है बड़ा सा, सीमेंट और लोहे से भरा जहाँ मेरे अपने बुढ़ापा काट रहे हैं, बुढापे के तमाम रोगों और कुछ किरायेदारों के साथ; टेलीफोन में उनकी औलादें अक्सर दिखती हैं...कहीं दूर..थोड़ी चिंता, थोड़ी मजबूरियां , थोड़ी जिद्द , ढेरों मानताओं और आशंकाओं के मध्य जीवन यहाँ भी चलता है...गुमसुम सा ...बेनाम...जैसे अपनी पहचान अतीत में छोड़ आया हो..रोज़ यहाँ एक सा होता है..ठहरा हुआ.
इस देश के मध्य में एक स्टील का कारखाना है, और उसके इर्द गिर्द बसा हुआ है एक छोटा सा शहर; कोई रहता हैं वहां जिसकी भेजी हुई राखी और प्रार्थनाएं सदैव सुख फैलाती हैं... जिसने परिवर्तित कर दिया कठिनाई को सहूलियत में...वह उसका घर है जिसमे से बहे पसीने की महक नहीं जाती; पसीने का रंग अब चटक हो चला है, संवरते दिन रोज़ कुछ नया विचार लाते हैं, कुछ भविष्य जगमगाते हैं; यहाँ दिन बदलते रहते हैं...घर के जवान प्राणियों के आवागमन के बीच...ठहराव तो है पर रुका भी नहीं है.
कुछ समंदर पार वह गोरे लोगों की नगरी है...व्यवसाय और बेहतरी की आकांशा कितनो को ही वहां उड़ा ले गयी, कुछ ऐसे भी हैं जिनके पाने की इच्छा खोने के डर पर भारी थी...साहसी और समझदारों की दुनिया है वो...जिन्हें कोई शक नहीं की वो क्या चाहते हैं और उसे कैसे पा सकते हैं; वहां भी एक बड़ा घर है, बेहतरीन और सुसज्जित...तस्वीरों में देखा हैं मैंने...वहां भी है मेरी दुनिया का एक कोना; छोटी छोटी परियां जो शायद रोज़ बढ़ती हैं, और वहां है एक एहसास का किस्सा...एक खून का हिस्सा; निश्चित ही ठहरा हुआ होगा क्योंकि अक्सर दिखता नहीं है...पर एहसास कभी कम नहीं होता.
फिर यहाँ मैं हूँ , अपने दूसरे आधे के साथ और साथ में हमारी पूरी बड़ी होती दुनिया और किराए का मकान...गुज़रते दफ्तरों के दिन, चहलकदमी करती रातें, टूटते, बिखरते, संवरते, संजोते सपने और अपनों में ही मशगूल अपने... पेट्रोल और दूध की थैलियों के साथ आशाओं में पनपता जीवन, खोजने और पाने की कोशिशों में बहकते विचार, और अरसे बाद फिर से चलती एक कलम; और यहीं मेरे साथ ही रहते हैं एहसास जिनमे हैं शामिल मेरा गाँव, अपनों का बुढ़ापा, कारखाने का नगर और समंदर पार दूसरे ज़मीं की गहराइयाँ...इसमें ही शामिल हैं दोस्त जो छिटके हुए हैं असीमित धरती की सीमित दूरियों में, या फिर बंद रहते हैं कंप्यूटर की घड़ियों में...इसमें हैं सहपाठी, सहकर्मी, पड़ोसी, और कुछ विदेशी...इन्ही एहसासों में है कल का कलरव, और इसी में आज का सच है, इसी में कल की भागदौड़ है और इसी में में बंद एक जहाँ और है; यह सब चलता है...रुका हुआ नहीं है, पर इसमें भी ठहराव है...दिखता नहीं है पर रहता है...मुस्कुराते हुए, मुहं बाए हुए, मैं इसी ठहराव में चलता हूँ, हँसता हूँ, रोता हूँ, बदलता हूँ, सिंचता हूँ, भीगता हूँ, सूखता हूँ...परिवर्तन होता रहता है पर मेरा बिखरा हुआ ठहराव साथ रहता है...वो मेरा अपना है.
गाँव से कुछ बीस कोस दूर एक शहर है; गंगा जमुनी भूगोल में सांस लेता हुआ...कहते है यहाँ बुद्धिजीवी रहते हैं, या शायद रहते थे क्योंकि अब दिखाई नहीं देते; शहर की सीमा के छोर पर राष्ट्रीय राजमार्ग के किनारे ठहरा हुआ एक हवाई अड्डा, और उसी से सटी एक भूतपूर्व सैनिकों की कालोनी....यहाँ एक मकान है बड़ा सा, सीमेंट और लोहे से भरा जहाँ मेरे अपने बुढ़ापा काट रहे हैं, बुढापे के तमाम रोगों और कुछ किरायेदारों के साथ; टेलीफोन में उनकी औलादें अक्सर दिखती हैं...कहीं दूर..थोड़ी चिंता, थोड़ी मजबूरियां , थोड़ी जिद्द , ढेरों मानताओं और आशंकाओं के मध्य जीवन यहाँ भी चलता है...गुमसुम सा ...बेनाम...जैसे अपनी पहचान अतीत में छोड़ आया हो..रोज़ यहाँ एक सा होता है..ठहरा हुआ.
इस देश के मध्य में एक स्टील का कारखाना है, और उसके इर्द गिर्द बसा हुआ है एक छोटा सा शहर; कोई रहता हैं वहां जिसकी भेजी हुई राखी और प्रार्थनाएं सदैव सुख फैलाती हैं... जिसने परिवर्तित कर दिया कठिनाई को सहूलियत में...वह उसका घर है जिसमे से बहे पसीने की महक नहीं जाती; पसीने का रंग अब चटक हो चला है, संवरते दिन रोज़ कुछ नया विचार लाते हैं, कुछ भविष्य जगमगाते हैं; यहाँ दिन बदलते रहते हैं...घर के जवान प्राणियों के आवागमन के बीच...ठहराव तो है पर रुका भी नहीं है.
कुछ समंदर पार वह गोरे लोगों की नगरी है...व्यवसाय और बेहतरी की आकांशा कितनो को ही वहां उड़ा ले गयी, कुछ ऐसे भी हैं जिनके पाने की इच्छा खोने के डर पर भारी थी...साहसी और समझदारों की दुनिया है वो...जिन्हें कोई शक नहीं की वो क्या चाहते हैं और उसे कैसे पा सकते हैं; वहां भी एक बड़ा घर है, बेहतरीन और सुसज्जित...तस्वीरों में देखा हैं मैंने...वहां भी है मेरी दुनिया का एक कोना; छोटी छोटी परियां जो शायद रोज़ बढ़ती हैं, और वहां है एक एहसास का किस्सा...एक खून का हिस्सा; निश्चित ही ठहरा हुआ होगा क्योंकि अक्सर दिखता नहीं है...पर एहसास कभी कम नहीं होता.
फिर यहाँ मैं हूँ , अपने दूसरे आधे के साथ और साथ में हमारी पूरी बड़ी होती दुनिया और किराए का मकान...गुज़रते दफ्तरों के दिन, चहलकदमी करती रातें, टूटते, बिखरते, संवरते, संजोते सपने और अपनों में ही मशगूल अपने... पेट्रोल और दूध की थैलियों के साथ आशाओं में पनपता जीवन, खोजने और पाने की कोशिशों में बहकते विचार, और अरसे बाद फिर से चलती एक कलम; और यहीं मेरे साथ ही रहते हैं एहसास जिनमे हैं शामिल मेरा गाँव, अपनों का बुढ़ापा, कारखाने का नगर और समंदर पार दूसरे ज़मीं की गहराइयाँ...इसमें ही शामिल हैं दोस्त जो छिटके हुए हैं असीमित धरती की सीमित दूरियों में, या फिर बंद रहते हैं कंप्यूटर की घड़ियों में...इसमें हैं सहपाठी, सहकर्मी, पड़ोसी, और कुछ विदेशी...इन्ही एहसासों में है कल का कलरव, और इसी में आज का सच है, इसी में कल की भागदौड़ है और इसी में में बंद एक जहाँ और है; यह सब चलता है...रुका हुआ नहीं है, पर इसमें भी ठहराव है...दिखता नहीं है पर रहता है...मुस्कुराते हुए, मुहं बाए हुए, मैं इसी ठहराव में चलता हूँ, हँसता हूँ, रोता हूँ, बदलता हूँ, सिंचता हूँ, भीगता हूँ, सूखता हूँ...परिवर्तन होता रहता है पर मेरा बिखरा हुआ ठहराव साथ रहता है...वो मेरा अपना है.
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