तुम्हारी सरफरोशी हम क्यूँ नहीं समझते,
देशप्रेम की मदहोशी हम क्यों नहीं समझते;
अब तो मनाते हैं हम भ्रष्टाचार की दिवाली,
और चुपचाप हैं देखते कोयले की दलाली,
कैसे कैसे गद्दारों को अब हम हैं सहते,
तेरे देश की संपत्ति को जो विदेश में रखते,
शर्मसार हैं हम, देश के सच्चे बन नहीं पाए,
तुम्हारा बलिदान सार्थक कर नहीं पाए,
सीनों पर खायी गोली हम क्यूँ नहीं समझते,
कुर्बानियों की होली हम क्यूँ नहीं समझते;
देशप्रेम की मदहोशी हम क्यों नहीं समझते;
अब तो मनाते हैं हम भ्रष्टाचार की दिवाली,
और चुपचाप हैं देखते कोयले की दलाली,
कैसे कैसे गद्दारों को अब हम हैं सहते,
तेरे देश की संपत्ति को जो विदेश में रखते,
शर्मसार हैं हम, देश के सच्चे बन नहीं पाए,
तुम्हारा बलिदान सार्थक कर नहीं पाए,
सीनों पर खायी गोली हम क्यूँ नहीं समझते,
कुर्बानियों की होली हम क्यूँ नहीं समझते;

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