Monday, March 19, 2012

तब क्या करोगे

एक समय,
जब आइनों में पुराना चेहरा,
नहीं देख पाओगे,
और लाख कोशिशों के बाद भी,
बालों की सफेदी नहीं रोक पाओगे;
जब  रोज़ दफ्तर से लौटते हुए,
शरीर, दिमाग की तरह ही थक जाएगा,
करवटों में आराम खोजोगे,
पर अगली सुबह भी दर्द नहीं जाएगा;
जब शाम की चाय के पहले ही,
बच्चे गणित के सवालों का हल पूंछेंगे,
कुछ बुद्धि बची होगी तो बताओगे,
वरना रोज़ खाली होता सर खुजाओगे;
जब टी. वी और अखबार की तरह ही,
रोज़ इसबगोल चाटोगे,
अपनी दिन पर दिन बढ़ती व्यथा,
किस प्रभु से बांटोगे;
जब भविष्य की चिंता में,
अपनी बचत का पासा फेंकोगे,
और सड़क पर रेंगती सुंदरियों की बजाय,
 इन्वेस्टमेंट का स्टेटस देखोगे;
जब हर दिन, और दिनों की तरह,
इन्ही उलझनों में निकल जाएगा,
तब कहाँ से स्फूर्ति लाओगे,
नया दिन कहाँ से आएगा;
इस सरपट भागते जीवन का,
ये भी एक अभिन्न  कोना है,
और कितना भी बीच में रहना चाहो,
कभी इस कोने में सब को होना है;
ज़रूरत यह है कि और रंगों कि तरह,
इस रंग से भी न इनकार करो,
बेशक बालों को रंगों कृत्रिम,
पर सफेदी को भी स्वीकार करो;
पुराने गाढे रंगों में,
थोड़ी सी सफेदी मिलाओ,
कुछ इधर से निकालो, कुछ उधर से डालो,
एक और नया रंग बनाओ;
बच्चों को स्कूल कि गणित न सही,
जीवन कि गणित पढ़ाओ,
इन्ही रास्तों पर रोज़ नए आयाम मिलेंगे,
थोड़ा सा हाथ बढाओ;

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