जब करो इंतज़ार तब घटा नहीं छाती,
बाग़ से सूखी मिटटी की महक नहीं जाती,
इतराना चाहता नीरज, फूलों के समंदर में,
पर तितलियों की बोली समझ नहीं आती;
बाग़ से सूखी मिटटी की महक नहीं जाती,
इतराना चाहता नीरज, फूलों के समंदर में,
पर तितलियों की बोली समझ नहीं आती;
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