धूप में कालीन सी फैली हरी घास,
और उस पर तालाब बनाता पानी,
चिड़ियों का फुदकना और कुछ चुनना,
और जब चाहे उड़ जाने की मनमानी,
जब उड़ने की आजादी हम में जिंदा है,
फिर मनमानी से क्यों ये मन शर्मिंदा है;
और उस पर तालाब बनाता पानी,
चिड़ियों का फुदकना और कुछ चुनना,
और जब चाहे उड़ जाने की मनमानी,
जब उड़ने की आजादी हम में जिंदा है,
फिर मनमानी से क्यों ये मन शर्मिंदा है;
No comments:
Post a Comment