Monday, October 10, 2022

 

ये नहीं उन्माद उसका,
घन ने जो ढँक लिया माँद,
दिख न पाया था ज़मीं से,
वह शरद पूनम का चाँद;

और हम बस यही समझे,
चाँद निष्ठुर हो गया है,
थी सुधा की आस पर अब,
भाग्य जैसे सो गया है;

सोच अपनी संकुचित है,
दृष्टि सीमित हो गयी है,
चीर जो देती थी घन को,
घन में जैसे खो गयी है;

अब नहीं है दवा बाकी,
क्षीण जो करती नशा को,
अब नहीं वह सूझ बाकी,
जो समझ पाती दशा को;

जब नहीं इच्छित हैं पाते,
भाग्य तब समझें गरल है,
ध्येय लेकिन जीवनी का,
अब भी समुचित है,सरल है;


 

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