ये नहीं उन्माद उसका,
घन ने जो ढँक लिया माँद,
दिख न पाया था ज़मीं से,
वह शरद पूनम का चाँद;
और हम बस यही समझे,
चाँद निष्ठुर हो गया है,
थी सुधा की आस पर अब,
भाग्य जैसे सो गया है;
सोच अपनी संकुचित है,
दृष्टि सीमित हो गयी है,
चीर जो देती थी घन को,
घन में जैसे खो गयी है;
अब नहीं है दवा बाकी,
क्षीण
जो करती नशा को,
अब नहीं वह सूझ बाकी,
जो समझ पाती दशा को;
जब नहीं इच्छित हैं पाते,
भाग्य तब समझें गरल है,
ध्येय लेकिन जीवनी का,
अब भी समुचित है,सरल है;
No comments:
Post a Comment