Monday, April 4, 2022

 


सुनी हैं कितनी ही दास्तान,
कहीं राहें थी अनजान,
कहीं पीड़ा में ईमान,
नहीं मिला कोई हासिल,
न ही कोई अंजाम,
रह गयी मोहब्बत नाकाम;

पर मोहब्बत का,
किसी अंजाम तक न पहुँच पाना,
और सब छूट कर भी,
अंदर कहीं रह जाना,
असल में होता है,
उसका मुकम्मल हो जाना। 

No comments:

Post a Comment