रास्तों पर चलते हुए कैसे वहम ले लिए,
जो अपने थे ही नहीं, वो भी ग़म ले लिए ;
आज वो चराग़ भी बहुत दूर हमसे रौशन है,
जिसकी रौशनी के लिए, हमने तम ले लिए;
बँट रहे थे पुरज़े बदन, सूखे से हाशिये पर,
बारी आयी नयनों की तो, हमने नम ले लिए;
मानते थे,वक़्त के साथ
हर ज़ख्म
भर जाएगा ,
वाह ज़िंदगी हमने भी, ये कैसे भरम ले लिए;
उन चुनिंदा पलों को कब तक सहेज पाओगे,
लेना था जिसे ज़्यादा, उसको ही कम ले लिए;
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