Friday, April 8, 2022

 


जीत के द्वार हम तो पहुँच न सके,
पाँव के किन्तु छाले कई दिन जले ; 

ऋतु भी प्रतिकूल थी, वेग लहरों का था,
पर थी हमने भी हिम्मत जुटाई हुई, 
साथ अपने भी यूँ तो, कई लोग थे,
सब पर हमने थी दौलत लुटाई हुई,

हमने पतवार उनके ही हाथों में दी,
जो कि चालाक थे, पर थे लगते भले;
जीत के द्वार....... 

राह बढ़ती गयी साथ बढ़ता गया,
हम भी खुश थे कि इक कारवाँ चल पड़ा,
जब भी आएगी अड़चन अकेले न हों,
अचरज दुनिया का ये आठवाँ चल पड़ा,   

साथ होंगे सदा, आसरा जिनका था, 
पीछे देखा तो सब जन गए थे चले; 
जीत के द्वार.......

गिरते पड़ते अकेले में सीखा है ये,
वक़्त उग्र है कभी और कभी नम्र है,
भूलने का भी कितना ही कर लो जतन,
होती लम्बी बहुत ग्लानि की उम्र है ,  

मौन में भी सदा, मन में हँसते रहे, 
रोते भी हम कहाँ, किससे मिल कर गले;
जीत के द्वार.......

हौसला, इतनी कोशिश है,बाकी रहे,
राह पूरी, अकेले हो चलने का दम,
चाँद अपना भी हो, थोड़ा धुंधला सही , 
हम बचें चाहे पूरे या पूरे से कम,

अब तो इतनी सी इच्छा है नीरज रही,
चाँद पहले उगे, तब ये सूरज ढले;

जीत के द्वार हम तो पहुँच न सके,
पाँव के किन्तु छाले कई दिन जले ; 

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