रोज़मर्रा की जिंदगी रोज़ ही मुंह बाए खड़ी रहती है I एक तरह की सुबह, एक ही तरह का दफ्तर, वहां तक पहुँचने का वही रास्ता, वही लोग, एक ही तरह का काम, उसी तरह की वापसी, वही घर, वही शाम और वही हतप्रभ सी घूरती रात I हतप्रभ सी इसलिए क्योंकि ये रात आश्चर्य करती है; कैसे गुज़ार लेते हैं हम प्रत्येक दिन एक ही तरह, किसी मशीन की तरह, भोर से अंधेर तक...और फिर भोर तक I यह मुझे अदभुत लगता है; इसलिए क्योंकि हर दिन मेरे साथ कुछ न कुछ नया होता है, अच्छा या बुरा पर कुछ अलग सा, परन्तु अगले दिन जब मैं मुड़कर देखता हूँ तो मुझे बीता दिन और दिनों की तरह ही लगता है...नियमित सा I ऐसा क्या है जो मुझे नया, नया सा नहीं दिखता; क्या है जो खो गया है; या क्या है जो अन्दर है पर दबा हुआ है, भूसे के ढेर में दबे गेहूं की बोरियों की तरह I
मेरे घर के बाहर टंगे झोले में रोज़ सवेरे चार बजे कोई व्यक्ति दूध के पैकेट्स डाल जाता है और उसी झोले में पड़े कागज़ के कूपन को निकाल जाता है I कोई पचास बरस का यह व्यक्ति पिछले सत्ताईस बरसों से यह काम लगातार कर रहा है I रोज़ तीसरी मंजिल की सीढियां चदता और उतरता है; कई अपार्टमेंट्स में; ऐसा क्या है इस कार्य में जो उससे जिंदा रखता है ? वह तो शायद कभी मन भर कर सुबह सोया ही नहीं; क्या ये महज़ पेट की आग है, या परिवर्तन की आशंकाओं का भय, या इस काम में उसे एक आनंद आता है, या कोई सुकून मिलता है I मैं नहीं जानता; मेरे गाँव में मोहना कुम्हार है जिसे आज मैं पैंतीस बरसों से चाक पर कुल्हड़ बनाते देख रहा हूँ I उसके बेटे ये काम नहीं करते और आज वो शहर जाकर कमा खा रहे हैं; मेरे पूछने पर वह कहता है कि बेटवा इही माटी से आई रहे, इही माटी में मिल जाब; सोचा इही माटी के साथे टैम निकाल लेई...माना कि ये उसका पुश्तैनी काम है पर क्या इंसान कभी ऊब नहीं जाता, या क्या उसे कभी बदलाव का मन नहीं करता, या क्या उसे इस माटी में वास्तव में वह सब कुछ दिखता है जिसे मैं दसों दिशाओं में नहीं देख पाता ?
ऐसे ढेरों सवाल रोज़ आते हैं और रात्रि को मेरे साथ बिना जवाबों के सो जाते हैं I ऐसा नहीं है कि जीवन में परिवर्तन नहीं हुए; अवस्थाएं बदली, परिवार बढे, कुछ कम भी हुए, कुछ रहन सहन बदला, नौकरी बदली, मकान बदले, मित्र बदले, यहाँ तक कि हाथ कि रेखाएं बदली ! कितने नए लोग, नई जगहें, नए आयाम मिले; कितने पुराने लोग नए अंदाज़ में मिले, कितने नए लोग पुराने अंदाज़ में बिछड़े; माता पिता, भाई बहन के परिवार के प्रति विचार बदले, अपने ही जीवन में भविष्य के प्रति चिंताएं बदली, वस्त्र बदले...शायद कुछ आत्माएं भी बदली; सब कुछ तो बदला...फिर क्या है जो रोज़ सुबह एक सा दिन मुहं बाए खड़ा रहता है और कहता है...कुछ नहीं बदला; तुम तब भी वही थे, तुम अब भी वही हो...निरर्थक...बिलकुल खाली I
गुप्त जी पंचवटी में कहते हैं,
"परिवर्तन ही यदि उन्नति है,
तो हम बढ़ते जाते हैं,
किन्तु मुझे तो सीधे सच्चे,
पूर्व भाव ही भाते हैं "
ये किन भावों कि बात कर रहे हैं? वो जो परिवर्तन से परे हैं या होने चाहिए ....ये क्या हमारे संस्कारों की बात है या उन मानवीय भावों की जिनमे अमूमन समय के साथ परिवर्तन नहीं होना चाहिए जैसे प्रेम, वात्सल्य, दया, क्रोध, द्वेष, इर्ष्या आदि ? यद्दपि इन भावों में बदलाव नहीं आये, किन्तु इनके क्रियान्वन में, या इन भावों को व्यक्त करने में अनेकों बदलाव आये हैं I फिर क्या है जो निरर्थक जान पड़ता है, जो खाली दिखता है, जिस पर उमंगें असर नहीं करती, जिस पर संदेह रहता है ?
शायद ये मेरे देखने का नज़रिया है...शायद; जब मुस्काते फूल दिखते हैं पर मुस्कराहट महसूस नहीं होती, जब व्यंजन का ज़ायका होठों पर नहीं टिकता, जब पायल का सम्मोहन चंद पलों का होता है, जब रागिनी की धुन सुनने के पश्चात गायब हो जाती है, जब भोर की किरणें धूप लगती हैं, जब सांझ की बेला भ्रम पैदा करती है, तो निश्चित ही दोष फूल,व्यंजन, पायल, रागिनी, किरण,या सांझ का नहीं है, इनको देखने वाली नज़रों का है, इन्हें महसूस करने वाली मासूमियत का है, इनको समझने वाले भावों का है.....मेरा है I
इन रास्तों पर भागते भागते कहीं बीच में कुछ गिर गया शायद...पर उसे खोजने वापस उन रास्तों पर जाने की ज़रूरत नहीं है I ये मेरे अन्दर है...हमेशा से था...हमेशा रहेगा; इसे मैं फिर उभार सकता हूँ, उन बोरियों को भूसे में से निकाल सकता हूँ, उन गेहुओं की रोटियां फिर खा सकता हूँ; ये मुश्किल नहीं है...नहीं होना चाहिए...महज़ अपने मन का डर निकालना है I अनिश्चित भविष्य की अनिश्चितता से नहीं घबराना है, जो है उसे पाना है, जो नहीं है वो कभी था ही नहीं I कुछ पुरानी पंक्तियाँ याद आती हैं;
"बसों नगर की ऑर अगर डरते हो वन से,
घर में छुपो अगर डरते हो काले घन से,
छुप जाने की जगह नहीं सारी दुनिया में,
अगर कहीं डरते हो तुम अपने ही मन से"
मेरे घर के बाहर टंगे झोले में रोज़ सवेरे चार बजे कोई व्यक्ति दूध के पैकेट्स डाल जाता है और उसी झोले में पड़े कागज़ के कूपन को निकाल जाता है I कोई पचास बरस का यह व्यक्ति पिछले सत्ताईस बरसों से यह काम लगातार कर रहा है I रोज़ तीसरी मंजिल की सीढियां चदता और उतरता है; कई अपार्टमेंट्स में; ऐसा क्या है इस कार्य में जो उससे जिंदा रखता है ? वह तो शायद कभी मन भर कर सुबह सोया ही नहीं; क्या ये महज़ पेट की आग है, या परिवर्तन की आशंकाओं का भय, या इस काम में उसे एक आनंद आता है, या कोई सुकून मिलता है I मैं नहीं जानता; मेरे गाँव में मोहना कुम्हार है जिसे आज मैं पैंतीस बरसों से चाक पर कुल्हड़ बनाते देख रहा हूँ I उसके बेटे ये काम नहीं करते और आज वो शहर जाकर कमा खा रहे हैं; मेरे पूछने पर वह कहता है कि बेटवा इही माटी से आई रहे, इही माटी में मिल जाब; सोचा इही माटी के साथे टैम निकाल लेई...माना कि ये उसका पुश्तैनी काम है पर क्या इंसान कभी ऊब नहीं जाता, या क्या उसे कभी बदलाव का मन नहीं करता, या क्या उसे इस माटी में वास्तव में वह सब कुछ दिखता है जिसे मैं दसों दिशाओं में नहीं देख पाता ?
ऐसे ढेरों सवाल रोज़ आते हैं और रात्रि को मेरे साथ बिना जवाबों के सो जाते हैं I ऐसा नहीं है कि जीवन में परिवर्तन नहीं हुए; अवस्थाएं बदली, परिवार बढे, कुछ कम भी हुए, कुछ रहन सहन बदला, नौकरी बदली, मकान बदले, मित्र बदले, यहाँ तक कि हाथ कि रेखाएं बदली ! कितने नए लोग, नई जगहें, नए आयाम मिले; कितने पुराने लोग नए अंदाज़ में मिले, कितने नए लोग पुराने अंदाज़ में बिछड़े; माता पिता, भाई बहन के परिवार के प्रति विचार बदले, अपने ही जीवन में भविष्य के प्रति चिंताएं बदली, वस्त्र बदले...शायद कुछ आत्माएं भी बदली; सब कुछ तो बदला...फिर क्या है जो रोज़ सुबह एक सा दिन मुहं बाए खड़ा रहता है और कहता है...कुछ नहीं बदला; तुम तब भी वही थे, तुम अब भी वही हो...निरर्थक...बिलकुल खाली I
गुप्त जी पंचवटी में कहते हैं,
"परिवर्तन ही यदि उन्नति है,
तो हम बढ़ते जाते हैं,
किन्तु मुझे तो सीधे सच्चे,
पूर्व भाव ही भाते हैं "
ये किन भावों कि बात कर रहे हैं? वो जो परिवर्तन से परे हैं या होने चाहिए ....ये क्या हमारे संस्कारों की बात है या उन मानवीय भावों की जिनमे अमूमन समय के साथ परिवर्तन नहीं होना चाहिए जैसे प्रेम, वात्सल्य, दया, क्रोध, द्वेष, इर्ष्या आदि ? यद्दपि इन भावों में बदलाव नहीं आये, किन्तु इनके क्रियान्वन में, या इन भावों को व्यक्त करने में अनेकों बदलाव आये हैं I फिर क्या है जो निरर्थक जान पड़ता है, जो खाली दिखता है, जिस पर उमंगें असर नहीं करती, जिस पर संदेह रहता है ?
शायद ये मेरे देखने का नज़रिया है...शायद; जब मुस्काते फूल दिखते हैं पर मुस्कराहट महसूस नहीं होती, जब व्यंजन का ज़ायका होठों पर नहीं टिकता, जब पायल का सम्मोहन चंद पलों का होता है, जब रागिनी की धुन सुनने के पश्चात गायब हो जाती है, जब भोर की किरणें धूप लगती हैं, जब सांझ की बेला भ्रम पैदा करती है, तो निश्चित ही दोष फूल,व्यंजन, पायल, रागिनी, किरण,या सांझ का नहीं है, इनको देखने वाली नज़रों का है, इन्हें महसूस करने वाली मासूमियत का है, इनको समझने वाले भावों का है.....मेरा है I
इन रास्तों पर भागते भागते कहीं बीच में कुछ गिर गया शायद...पर उसे खोजने वापस उन रास्तों पर जाने की ज़रूरत नहीं है I ये मेरे अन्दर है...हमेशा से था...हमेशा रहेगा; इसे मैं फिर उभार सकता हूँ, उन बोरियों को भूसे में से निकाल सकता हूँ, उन गेहुओं की रोटियां फिर खा सकता हूँ; ये मुश्किल नहीं है...नहीं होना चाहिए...महज़ अपने मन का डर निकालना है I अनिश्चित भविष्य की अनिश्चितता से नहीं घबराना है, जो है उसे पाना है, जो नहीं है वो कभी था ही नहीं I कुछ पुरानी पंक्तियाँ याद आती हैं;
"बसों नगर की ऑर अगर डरते हो वन से,
घर में छुपो अगर डरते हो काले घन से,
छुप जाने की जगह नहीं सारी दुनिया में,
अगर कहीं डरते हो तुम अपने ही मन से"
मध्यम वर्गीय परिवार से जुडी एक आम आदमी की रोज़ मर्रा जिन्दगी का बड़ा ही सूक्ष्म , सजीव चित्रण एवं उसकी मनोदशा का बड़ा ही मार्मिक चित्र खींचती हुई अद्भुत रचना .....
ReplyDeleteभाषा का प्रयोग भी बड़ा ही सुंदर किया गया है. एक लयात्मक सुंदर गद्य रचना ....
aabhar hai aapka Neeraj mala ji ...aapko pasand aaya...kritagya hun.
ReplyDeleteबहुत सुन्दर चित्रण एक बार फिर रोजमर्रा के जीवन का| अगर कुम्हार यां दूधवाला अपने जीवन से जुड़े है और उकता कर भी नहीं उकताए है तो शायद वो कहीं अपनी दैनिकता को अपना ही एक हिस्सा समझते हैं| मशीनी युग ने हमें अपनी संस्कृति से और अपनी मानवीयता से जुदा कर उकताहट भर दी है परन्तु जब हमारा कार्य प्रकृति से जुदा है और इस से हमें विस्तृत संसार के अर्थ को समझने की क्षमता प्रदान होती है तो वह कार्य कार्य न हो कर साधना बन जाता है| जिस प्रकार आप लिख कर बोर नहीं होते क्यूंकि इस से आपको ख़ुशी ही नहीं आत्म खोज में और स्वयं में लीन हो समझने की मानवीय जरूरत भी पूरी होती है, उसी तरह कोई कार्य या दैनिक जीवन से उकताहट होते हुए भी हम इसे ढोते रहते है क्यूंकि हमारा स्वयं से मिलन कभी पूरा नहीं होता| शायद इसे ही लोग अध्यात्म कहते है
ReplyDeleteThankyou Seemaji...
DeleteI'm sure you are right...Its the search of solitude i guess...thank you for reading this. your comments give me a some moments of joy in otherwise gloomy times.
but did i make sense? You are on asearch, definitely. Reading the above reminded me of Tagore's poem from Gitanjali:
ReplyDeleteShe who ever had remained in the depth of my being, in the twilight of gleams and glimpses; she who never opened her veils in the morning light, will be my last gift to thee, my God, folded in my final song.
Words have wooed yet failed to win her; persuasion has stretched her eager arms in vain.
I have roamed from country to country keeping her in the core of my heart, and around her have risen and fallen the growth and decay of my life.
Over my thoughts and actions, my slumbers and dreams, she reigned yet dwelled alone and apart.
Many a man knocked at my door and asked for her and turned away in despair.
There was none in the world who ever saw her face to face, and she remained in her loneliness waiting for thy recognition.
yes you do make sense...every time...almost :) Thank you for the Gitanjali poem.
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