इन गर्मियों में,
अकस्मात् छाये बादल,
कहते हैं की,
हम नहीं बरसेंगे...
तो क्या हम यूँ ही,
मोतियों को तरसेंगे....
पर मैं जानता हूँ,
की आज नहीं तो कल,
ये बरसेंगे...
क्योंकि मेरे पास,
पानियों का अभाव है,
और बरसना तो,
बादलों का स्वभाव है...
आँख मिचौली खेलती धूप,
कहती है मुझे पकड़ो,
और हर बार,
छिटक कर दूर चली जाती है,
और मेरे मायूस होने पर,
फिर पास चली आती है...
मैं जानता हूँ की,
वो मुझे चिढ़ाती है,
उसके और मेरे बीच,
दूरियां कहाँ नपनी है;
और वो कहीं भी चली जाए,
ये धूप मेरी अपनी है.....
ये आज है मेरा,
जो कल के मिलन को सरक रहा है,
ये दिल नहीं मीठा सा दर्द है,
जो ज़ोरों से धड़क रहा है...
ये कुछ बची तमन्नाएं हैं,
जो ख़ुशी से झूलती हैं,
जैसे खुली आंच पर,
घर की रोटियां फूलती हैं...
जब कल आएगा,
छिटकी चांदनी में बरसात लाएगा,
मेरी खिड़की का पट तब,
भीग जाएगा...
और गर्मियों में तपा,
बालकनी में रखा,
मेरे चमड़े का जूता भी,
भीगना सीख जाएगा...
अकस्मात् छाये बादल,
कहते हैं की,
हम नहीं बरसेंगे...
तो क्या हम यूँ ही,
मोतियों को तरसेंगे....
पर मैं जानता हूँ,
की आज नहीं तो कल,
ये बरसेंगे...
क्योंकि मेरे पास,
पानियों का अभाव है,
और बरसना तो,
बादलों का स्वभाव है...
आँख मिचौली खेलती धूप,
कहती है मुझे पकड़ो,
और हर बार,
छिटक कर दूर चली जाती है,
और मेरे मायूस होने पर,
फिर पास चली आती है...
मैं जानता हूँ की,
वो मुझे चिढ़ाती है,
उसके और मेरे बीच,
दूरियां कहाँ नपनी है;
और वो कहीं भी चली जाए,
ये धूप मेरी अपनी है.....
ये आज है मेरा,
जो कल के मिलन को सरक रहा है,
ये दिल नहीं मीठा सा दर्द है,
जो ज़ोरों से धड़क रहा है...
ये कुछ बची तमन्नाएं हैं,
जो ख़ुशी से झूलती हैं,
जैसे खुली आंच पर,
घर की रोटियां फूलती हैं...
जब कल आएगा,
छिटकी चांदनी में बरसात लाएगा,
मेरी खिड़की का पट तब,
भीग जाएगा...
और गर्मियों में तपा,
बालकनी में रखा,
मेरे चमड़े का जूता भी,
भीगना सीख जाएगा...
full of hope and hardiness called life..simple poetry, full of subtle observations and zest; statement of a belief that one will always be provided for whatever is needed at appropriate time...and the symbol of forsaken leather shoe tells us that the worry, the mistrust that the things might not happen the way we wanted..will eventually be resolved, as the evergreen hope and trust will see the days through to their desired end.....wonderful again
ReplyDeletethank you Seema...you have an eye to analyse...even the writer never thought all this while writing ...:)
ReplyDelete