कोई नदी नहीं है, समंदर भी नहीं है,
कोई पोखर नहीं, कोई झरना भी नहीं है,
फिर भी इक लहर है,
जो बही चली आती है,
दूर तक इक नीर की बूँद भी नहीं,
ये कैसी तन्हाई है,
जो भिगोकर चली जाती है...
ये कुछ यादों की रेशम है,
इसमें मखमल है,
इसमें एहसास है,
सिसकती शबनम है;
ये मेरे उजाले की बाती है,
कोई कुछ भी कहे,
पर मुझे अब भी,
याद आती है,
मैं इसकी कशिश को,
आहिस्ता आहिस्ता चुनता हूँ,
कोई जुलाहा नहीं हूँ,
पर बड़ी तल्लीनता से,
रेशम बुनता हूँ.....
कोई पोखर नहीं, कोई झरना भी नहीं है,
फिर भी इक लहर है,
जो बही चली आती है,
दूर तक इक नीर की बूँद भी नहीं,
ये कैसी तन्हाई है,
जो भिगोकर चली जाती है...
ये कुछ यादों की रेशम है,
इसमें मखमल है,
इसमें एहसास है,
सिसकती शबनम है;
ये मेरे उजाले की बाती है,
कोई कुछ भी कहे,
पर मुझे अब भी,
याद आती है,
मैं इसकी कशिश को,
आहिस्ता आहिस्ता चुनता हूँ,
कोई जुलाहा नहीं हूँ,
पर बड़ी तल्लीनता से,
रेशम बुनता हूँ.....
and don't your readers love the silky stories/accounts you write of these memories.
ReplyDelete