Sunday, May 15, 2011

असमतल धरती...सरल जीवन

ये रास्ते काफ़ी दूर तक साथ चलते हैं I चीड़ों की आवारगी भी इनके साथ चलती है, और साथ चलते हैं कुछ हल्के तैरते बादल और इन पहाड़ों के लोगों की हल्की तैरती हसरतें I ये पहाड़ कुछ नहीं बोलते, बस खड़े रहते हैं; जैसे किसी निरंतरता के प्रतीक हैं I सड़क के अनगिनत मोड़ों पर मुडती गाड़ी अनायास ही चलती रहती है, मानो ये उसका नियम है; मानो वो इन सब से भली भांति परिचित है I इसी सड़क के एक मोड़ से कुछ नीचे उतर कर, और कुछ ऊपर चढ़ कर, कुछ टेढ़ी मेढ़ी पगडंडियों से गुज़र कर, कुछ पथरीली सीढियां चढ़कर....एक घर है; जिसके गुसलखाने में एक बाल्टी में भिगोये हुए कुछ कपड़े हैं जो अपने हिस्से की धूप की प्रतीक्षा कर रहे हैं I

यह एक छोटा किन्तु बड़े ही सलीके का घर है I एक कमरा और उससे ही किसी पेड़ की डाल की तरह निकली छोटी सी रसोई और कमरे से जुड़ा गुसलखाना जिसके बाहर का दरवाज़ा बिल्ली की दया दृष्टि से बंद रहता है; बेशक अन्दर कोई हो या न हो I लकड़ी की छत, और कमरे की ही दीवार से सटी लकड़ी की सीढ़ी जो ऊपर छज्जे की तरफ जाती है I ये एक लोफ्ट है, यानि की दोछत्ति I इसी लोफ्ट से पूरब की ऑर निकलती छोटी छोटी तीन खिड़कियाँ हैं जो इन पहाड़ों की लाचारी रोज़ देखती हैं I कमरे का दरवाज़ा खोलते ही छनी हुई धूप अपने होने का आभास  देती है I

घर के बाहर निकलते ही लगभग पांच वर्ग मीटर का घास युक्त मैदान, यहाँ वहां गमलों में और यूँ ही धरती पर रोपे फूलों के पौधे, ढलान से बातें करते आडू और प्लम के हल्के से शर्मीले छोटे वृक्ष और उनमे जन्मे छोटे छोटे फल जिनके बढ़ने का इंतज़ार उन्हें भी है और इस घर के प्राणियों को भी; और अवश्य ही कुछ व्यापारियों को भी I कुमाउन की पहाड़ियों पर एक छिटके से गाँव का एकांत में खड़ा यह घर कई आशाओं को एक साथ बयान करता है I

साथ ही है जुड़ा हुआ मकान मालिक का घर जिसमे रहते हैं दो पिल्ले, एक बिल्ली, एक आदमी, उसकी औरत और उनके चार बच्चे और दो मवेशी I और एक किरायेदार...और उसकी ढेर सारी आशाएं, आकान्शाएं और शायद थोड़ी सी अपेक्षाएं I सब को प्रतीक्षा है; हर जीवन प्रतीक्षा करता है; कभी कभी तो ये भी नहीं पता लगता की ये प्रतीक्षा किसके लिए है या ये बस यूँ ही है..अनायास I
सूरज यहाँ पहाड़ों से छिप कर निकलता है, और जब तक लिहाफों के अन्दर से हम आँखें खोलते हैं, सूरज हमारे चेहरे पर होता है...जैसे ये दूर पूरब से न निकल कर इस घर के ऊपर ही उगा था I बाल्टी में भिगोये कपडे अब भी प्रतीक्षा करते हैं ; उन्हें अपने हिस्से का और पानी चाहिए...और धूप भी I

असमतल और उबड़ खाबड़ धरतियों पर चीड़ सीधे खड़े रहते हैं; प्रेरणा देते हुए की जीवन सरल रहता है यदि हम स्वयं को सीधा रख सकते हैं; इन असमतल रोज़मर्रा की मुसीबतों के बीच I पैंतालिस मिनट के लगातार चढ़ाई और ढलान के बाद एक दफ्तर है I इन रास्तों पर धीरे धीरे चढ़ते उतरते कदम बहुत दूर तक दीखते हैं; कन्धों पर पिठूनुमा बैग टाँगे हुए; कानों में इअरफोन; संगीत को अपनी इस रोज़ की आवाजाही का हिस्सा बनाते हुए I अचानक ही वो कदम दीखने बंद हो जाते हैं; शायद इस पहाड़ के दूसरी ऑर चल रहे हैं, क्योंकि उनके दिखने का आभास काफ़ी देर तक रहता है; ठीक वैसे ही जैसे किसी पक्षी को कुछ देर हथेलियों में पकड़ने के बाद हम छोड़ देते हैं; खाली हथेलियों में उसकी मौजूदगी की गर्माहट उसके उड़ जाने के बाद भी काफ़ी देर तक महसूस की जा सकती है I

शाम को वही कदम उन्ही रास्तों पर वापस आते हैं; उसी अंदाज़ में जैसे वो गए थे I उनमे सिमटी थकान कोशिशों के उपरान्त भी ज़ाहिर होती है I यहाँ शाम अचानक ही आ जाती है क्योंकि सूर्य इन ऊंची पहाड़ियों के पीछे अचानक ही खो जाता है; और शाम के उजाले में ही चाँद दिखता है; कुछ शर्मसार सा; जैसे कोई स्त्री नहाने के बाद शर्माती है, खुले केशों में I बहुत सारी हसरतों और चाय के साथ शाम का आलिंगन रात से होता है; यही वो समय है जब जीवन बहुत थोड़े समय के लिए रुकता है..एक गुज़रे दिन में झांकता है, और आने वाले कल को बंद झरोखों से देखने की कोशिश करता है I कुछ हसरतों की आग पर कटी सब्जी गीले चावलों से मिलकर भाप में पकती है; कुछ वोदका गले के नीचे उतरते हुए  एक सीने को तरल करता है; और थोड़ा व्याकुल भी I फिर बहुत सारे सपने एक साथ आते हैं और थोड़े से नशे के बीच हसरतों की इकट्ठी हुई भीड़ में से हकीकत अपना सर ऊपर उठा कर कहती है कि मुझे देखो...असलियत में मैं ही हूँ...बाकी सब तुम्हारा ख़याल है I ग्लानि और नशे का शरीर रजाइयों में सोता है; हसरतें जगी रहती हैं, और बिजली के कृत्रिम प्रकाश में भी अँधेरा साफ़ दिखता है...ऊपर लोफ्ट में एक कंप्यूटर काफ़ी रात तक चलता है I

इस रात कि सुबह कई बार आती है; रात में भी और भोर में भी I यह अजीब है क्योंकि इसमें बीते आभास की झलक दिखाई देती है I वही कल का सूरज फिर निकलता है और मेरे ऊपर हँसता है, जैसे मेरे ख्यालों को वो रात भर पढता रहा था I दो प्याले चाय, और धुंए के उपरान्त उपमा और रात के बचे चावल एक बोझिल सी शांति के बीच पेट से आलिंगन करते हैं I हमारी सामाजिकता हमारा गहना भी है और शायद मज़बूरी भी I हमारी कथनी और करनी का फर्क यह साफ़ ज़ाहिर करता है की जब तक कोई ख़ास मज़बूरी नहीं आती, हम ये गहने नहीं उतारते I क्या हो सकता था और क्या नहीं हुआ के मद्देनज़र सामान फिर से बैग में सिमटने लगता है; कपडे तह हो जाते हैं, और हसरतों के जनाजे के साथ बैग की चेन एक सरसराहट सी करती हुई बंद हो जाती है I साथ ही दो दिनों से बाल्टी में भीगे कपडे धुल कर धूप के प्रेम को पाते हैं I इन कपड़ों से रिसता पानी ज़मीन का साथ पाकर उसमे ही खो जाता है; हसरतों के विपरीत I

बच्चे बस्तों के साथ पहाड़ियां चढ़ते उतरते हैं; कहीं इन्ही पहाड़ियों में छिपा एक स्कूल मेरा भी है; अभी वो नहीं दिखता पर निश्चित ही वो मुझे पुकारता है I अपना सामान समेट कर और कन्धों पर लादे, चढ़ती साँसों के बीच मैं कहीं से दूर निकलता हूँ, थोड़ा सा और अपने पास जाने के लिए I एक असमंजस भरा पाठ और सीखता हूँ; फटे हुए चमड़े में एक टांका और लगाता हूँ, एक नए से आभास के बीच आधा दिन और निकल जाता है और उन चीड़ के पेड़ों के बीच से होता हुआ टेढ़े मेढ़े रास्तों पर गाडी फिर सरकती है I इन पहाड़ों से दूर...समतल धरती की ऑर जहाँ जीवन इतना सरल नहीं है I


4 comments:

  1. itna sajeev chitran hai is prose main aur uske saath jaise ki........vibhin upmaaye bahut hi accha combination banta hai inka aapki rachna main

    dil aur dimaag ko choo letee hai yh rachna....

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  2. you are very good at painting pictures with words, took me to a distant hill station, dalhousie, i visited few years back. very live description of scenes and life in a lonely, out of the main stream location. the attempt to join the mainstream (from asmtal to smtal) is described so well. samajikta hamara ghna hai..says it all..man is a social animal and wants to fight it out in full social perimeters, wants to achieve his full potential, and wishes recognition from his fellow beings. youth wants to embrace life in its fullness..very well shown by this marvellous piece. u're very imaginative and expressive, neeraj..thanks

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  3. its just real self experience...very easy to write...didn't have t imagine anything...glad you liked.

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