जेठ की दुपहरी में भी,
लू से दोस्ती की है,
नीम के आँचल तले,
छाँव से मसख़री की है,
तेरे हर ज़ुल्म पर शरारत की है,
ज़िंदगी तुझसे इतनी मोहब्बत की है;
सूख गयी थी आँखें फिर भी,
पलकों ने हिमाकत की है,
बन्द नज़र कर के हमने,
क़ैद पर रियायत की है,
क्या हुआ जो तुमने सियासत की है,
ज़िंदगी तुझसे इतनी मोहब्बत की है;
कलह की ठंडी दीवारों पर,
आस की कढ़ाई की है,
तुमने जितना कसा हमको,
हमने उतनी ढिलाई की है,
वक़्त से भी कब शिकायत की है,
ज़िंदगी तुझसे इतनी मोहब्बत की है;
Waaah
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