Monday, July 15, 2019

कहाँ अब जुगनुओं से रात में भी फूल खिलते हैं,
कहाँ अब घर पहुंचकर हम कहीं घर से निकलते हैं,
इसे फुर्सत कहें नीरज या है ये व्यस्तता कोई,
कि अब तो दोस्त भी मोबाइल के परदों पर मिलते हैं;

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