Tuesday, July 9, 2019



अब तुम  याद नहीं आते,
बस मौज़ूद रहते हो,
इर्द गिर्द,
एक शख्श है यहाँ,
कद काठी, शक्ल वैसी ही,
उम्र और चाल भी,
बिलकुल तुम सी,
वह लगभग रोज़ ही दिखता है,
मेरे दफ़्तर के रस्ते में,
दूर से लगता है,
जैसे तुम आ रहे हो,
झोले में साग सब्ज़ी लिए,
पैदल,
और मैं गाड़ी की रफ़्तार,
कम कर देता हूँ ,
शायद तुम मुझे पकड़ा दो,
झोला ,
और निकल जाओ,
पड़ोसी से मिलने।
पास आने पर,
उसकी उँगलियों में,
फंसी बीड़ी,
बताती है,
ये तुम नहीं हो...... ,

पांच साल होने को है,
पर अब भी,
सब्ज़ी का झोला लिए,
मैं जब,
घर में दाखिल होता हूँ,
तुम अक्सर पूछ लेते हो,
पालक क्या भाव थी,
बथुआ नहीं लाये क्या,
मैं अचानक पलट कर देखता हूँ ,
तुम वही भीनी सी मुस्कान लिए,
स्थिर हो,
दीवार की खूँटी पर।

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