Monday, March 25, 2019

कैसे मान जाते तब कि वह सच बोल रहा होगा ; तब हम कितनी ही बातें किया करते थे।  एरिस्टोटल से लेकर आर्यभट्ट तक और लेनिन से लेकर ज्योति बासु तक। वीनू मांकड़ से गुंडप्पा विश्वनाथ तक और वी शांताराम से मनमोहन देसाई तक। तब, जब न विकिपीडिआ  था और न ही गूगल, जब न ही मोबाइल फ़ोन था और न ही था कोई इंटरनेट; अलबत्ता एक रेडियो ज़रूर था जिसे चलाने के पांच मिनट बाद  हलकी सी हरी रौशनी से जसदेव सिंह की आवाज़ सुनाई पड़ती थी और हम कान लगाए मोहम्मद शाहिद की ड्रिब्लिंग स्किल्स आँखों से सुना करते थे। तब, जब हमारे संसाधन न के बराबर थे और विकल्प सीमित थे.....फिर भी... तब भी  ..... हम ज्ञान के अनोखे भण्डार थे। दीन दुनिया की खबर रखने वाले और हर खबर पर बहस करने की क्षमता रखने वाले बुद्धिजीवी थे हम।  यह बात उन दिनों की है जब दिन और रात के बीच शाम आया करती थी। 

उस पार्क में वह लोहे का बना झूला था, कुछ अंग्रेजी के डी आकार का जिसे शायद बंदरबाँट कहते हैं।  कभी उस पर उल्टा लटक कर बात करते, बिलकुल न्यूटन के सिद्धांत के विपरीत तो कभी ऊपर चढ़ कर बैठ जाते। हमारा कितना ही ज्ञान उन लोहे की छड़ों ने सोख रक्खा था। मुझे नहीं लगता कि उस समय उस जगत का कोई भी विषय हमसे अछूता रहा होगा। मुझे याद है उस दिन एस्ट्रोलॉजी पर बात चल रही थी।  ये हाथ की रेखाएं, ग्रहों की स्थिति, सोलर और लूनर राशियाँ आदि आदि।  ये रेखा उम्र की, ये विवाह की, ये बच्चों की, ये स्वास्थ्य की और ये धन संपत्ति की   .... हमारी हथेलियों पर ये सब लकीरें बिलकुल साफ़ सुथरी थीं।  क्या ये लकीरें बाद में बदल जाएँगी?
 मेरे इस सवाल पर उसने दो टूक कहा था "मुट्ठी बंद रखना सीख जाओगे तो लकीरें नहीं बदलेंगी "

अब किसके लिए मुट्ठी बंद रखते ; कैसे मान जाते तब कि वह सच बोल रहा होगा।

neeraj tripathi (diary with friends)



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